Teachers often provide Class 5 Hindi Notes Veena Chapter 5 सुंदरिया Summary in Hindi Explanation to simplify complex chapters.
सुंदरिया Class 5 Summary in Hindi
सुंदरिया Class 5 Hindi Summary
सुंदरिया का सारांश
‘सुंदरिया’ एक गाय की कहानी है। इसके रचयिता जैनेंद्र कुमार हैं। इसमें कुछ ऐसे शब्दों का भी प्रयोग किया गया है, जो प्रारंभिक हिंदी में प्रचलित थे।
सुंदरिया हरियाणा के हीरा सिंह नामक किसान की गाय थी। घर वाले उसे बहुत प्यार करते थे। किसान का बेटा जवाहर सिंह उसे ‘मौसी’ कहता था। घर में तंगी आने पर हीरा सिंह शहर आकर एक सेठ के यहाँ चौकीदारी करने लगा। सेठ को एक अच्छी गाय की आवश्यकता होने पर उसने अपनी गाय 207 रुपये में बेच दी। मगर उसका मन गाय में ही लगा रहा। गाय भी नई जगह आकर खुश नहीं थी। वह सही से दूध नहीं देती थी। इससे हीरा सिंह को सेठ की बातें सुननी पड़ती थीं तथा वह परेशान रहता था।

पूरा दूध नहीं मिलने तथा कुछ उल्टा-सीधा होने पर सेठ ने हीरा सिंह को अपनी गाय वापस गाँव भेजने तथा लिए गए पैसे लौटाने के लिए कहा। लेकिन हीरा सिंह पैसे लौटाने की स्थिति में नहीं था, क्योंकि उसने काफ़ी पैसे खर्च कर दिए थे। उसने सेठ से गाय के पैसे अपनी तनख्वाह से काटते रहने की बात कही तथा गाय को वापस गाँव ले आया।
सुंदरिया Class 5 Summary in Hindi
- बच्चों में कहानी पढ़ने, सुनने और समझने की क्षमता विकसित होगी।
- कहानी से संबंधित शब्दावली और वाक्य निर्माण सीखेंगे।
- जानवरों की देखभाल, सुरक्षा और अपनत्व (लगाव) के प्रति भावना जागृत होगी।
- बच्चें पशुओं की भावनाओं और जरूरतों को पहचानना सीखेंगे।
यह कहानी हरियाणा के किसी गाँव के हीरासिंह नामक एक गरीब किसान की है, जो अपनी ‘सुंदरिया’ गाय को भी अपने बीवी-बच्चों की तरह चाहता है। हीरासिंह का परिवार भी सुंदरिया गाय को बहुत प्यार करता है। उनका बड़ा बेटा जवाहरसिंह तो ‘सुंदरिया’ को मौसी कह कर बुलाता है। घर के सभी सदस्य ‘सुंदरिया’ का पालन-पोषण परिवार की तरह करते हैं।
एक दिन हीरासिंह नौकरी की तलाश में दिल्ली आता है। उसे किसी सेठ के यहाँ चौकीदार की नौकरी मिल जाती है। सेठ किसी दिन हीरासिंह को गाय खरीदने की बात कहता है, तो वह कहता है कि- मेरी नज़र में एक गाय है, वह दूध देने में भी कामधेनु है। पंद्रह सेर दूध देती है। बातों-बातों में हीरासिंह ने बोल दिया- सेठ जी, असल में वह मेरी ही गाय है। सेठ जी खुश होकर दो सौ पाँच रुपए कीमत लगा देते हैं। हीरासिंह उसी दिन गाय लेने चला गया। वह जवाहरसिंह को समझा-बुझाकर गाय ले आया। गाय देखकर सेठ बहुत खुश हुए। हीरासिंह ने खुद उसे सानी-पानी देकर सहलाया और फिर अपने हाथों से दुहा दूध पंद्रह सेर से ऊपर बैठा ।
घोसी को बुलाकर सेठ जी ने गाय उसके सुपुर्द कर दी। हीरासिंह ने गाय को थपथपाया तो वह घोसी के साथ चली गई। लेकिन उसने वहाँ जाकर पाँच सेर दूध ही दिया। जिससे सेठ जी नाराज हो गए। हीरासिंह गाय के पास गए और घोसी से कहा- ‘बाल्टी लाओ’। उसके बाद साढ़े तेरह सेर दूध निकालकर घोसी को दे दिया। कहा- यह दूध सेठ जी को दे देना। दूसरे दिन भी वही हुआ, गाय ने पूरा दूध नहीं दिया। सेठ जी ने हीरासिंह को बुलाकर कहा, यह क्या है? यह तो सरासर धोखा है। हीरासिंह चुप रहा । सेठ जी ने कहा- अपनी गाय ले जाओ और मेरे रुपये वापस करो। लेकिन हीरासिंह रुपये गाँव भेज चुका था जो मकान की मरम्मत में लग गए थे। अब सेठ जी को देने के लिए रुपए कहाँ से लाए? एक दिन ‘सुंदरिया’ दयनीय स्थिति में हीरासिंह के दरवाजे पर खड़ी मिलती है। यह देखकर हीरासिंह बेचैन हो जाता है और उसकी आँखों में आँसू आ जाते हैं और सेठजी को बिना बताए सुंदरिया गाय को लेकर घर चल देता है।
इस पाठ से हमें यह शिक्षा मिलती है कि इंसान और पशुओं के बीच भावनात्मक संबंध होता है मगर कई बार मनुष्य जानवर समझकर अपनत्व नहीं दर्शाता ।
सुंदरिया शब्दार्थ –
परवरिश – पालन-पोषण,
बंदोबस्त – प्रबंध,
कामधेनु – सब कामनाओं को पूरा करने वाली स्वर्ग की गाय,
सिर्पुद – सौंपना,
तनख्वाह – वेतन,
ड्योढ़ी – दहलीज़,
रुसवाई – बेइज्जती,
मसनूई – बनावटी,
करतूत – काम,
विह्वल – व्याकुल,
घोसी – एक जाति का नाम।
Class 5 Hindi Chapter 5 Summary सुंदरिया
हरियाणा के किसी गाँव में हीरासिंह नामक एक किसान था । उसकी समझ में यह नहीं आता था कि वह अपने बीवी-बच्चों और अपनी प्यारी गाय सुंदरिया की परवरिश कैसे करे?
सुंदरिया गाय डील-डौल में काफी बड़ी थी। उसे देखकर लोगों को ईर्ष्या होती थी। गरीबी के कारण हीरासिंह गाय का चारा भी नहीं जुटा पाता था। खाने-पीने की कमी होने लगी तो हीरासिंह ने सोचा ‘मैं सुंदरिया को बेच दूँ?” पर उसका बड़ा लड़का जवाहरसिंह सुंदरिया को मौसी कहा करता था। इसलिए वह उसे बेचने से डरता था।

नौकरी की तलाश में वह दिल्ली चला आया। वहाँ उसे एक सेठ के यहाँ चौकीदार की नौकरी मिल गई। एक रोज सेठ ने हीरासिंह से कहा- “तुम तो हरियाणा के रहने वाले हो। वहाँ की गायें अच्छी होती हैं। एक गाय का बंदोबस्त कर दो।”
हीरासिंह सुंदरिया की बात सोचने लगा। उसने कहा- “एक है मेरी निगाह में।”
सेठ ने कहा – “कैसी गाय है?”
हीरासिंह बोला-“गाय तो ऐसी है कि दूध देने में कामधेनु। पंद्रह सेर दूध उसके तले उतरता है। उसके दो सौ रुपए तक लग चुके हैं।”
सेठ बोला – “चलो, पाँच हम ज्यादा दे देंगे?”
हीरासिंह ने तब साफ- साफ ही कह दिया – “सेठ जी, सच यह है कि वह गाय अपनी ही है।”
सेठ जी ने खुश होकर कहा- “तब तो अच्छी बात है। तुम्हारे लिए जैसे दो सौ, वैसे दो सौ पाँच ।”
हीरासिंह लाज से गड़ गया कि वह कैसे बताए कि सुंदरिया उसके परिवार का अंग है। पर उसने सोचा कि सेठ के यहाँ रहकर गाय तो उसकी आँखों के आगे रहेगी। सेठ ने सौ रुपए मँगाकर उसी वक्त हीरासिंह को थमा दिए । कहा- “देखो हीरासिंह, आज ही चले जाओ। कब तक वापस आ जाओगे?”
हीरासिंह ने कहा-“पाँच दिन तो लगेंगे ही।”
सेठ जी ने कहा “पर ज्यादा दिन मत लगाना।”
हीरासिंह उसी रोज गाय लेने चला गया। जैसे-तैसे जवाहरसिंह को समझा-बुझाकर वह गाय ले आया। गाय देखकर सेठ बहुत खुश हुए। सचमुच वैसी सुंदर, स्वस्थ गाय उन्होंने अब तक न देखी थी। हीरासिंह ने खुद उसे सानी-पानी दिया, सहलाया और अपने हाथों से दुहा। दूध पंद्रह सेर से कुछ ऊपर ही बैठा। सेठ जी ने सौ के ऊपर सात रुपए उसे और दे दिए। सौ रुपए वह पहले ही ले चुका था। घोसी को बुलाकर सेठ जी ने गाय उसके सिपुर्द कर दी।

रुपए तो ले लिए लेकिन हीरासिंह का जी भरा जा रहा था। जब घोसी गाय को ले जाने लगा, तब गाय उसके साथ जाना ही नहीं चाहती थी।
हीरासिंह बोला “गाय की नौकरी पर मुझे लगा दीजिए। चाहे तनख्वाह कम कर दीजिए।”
सेठ जी ने कहा-“हीरासिंह, तुम्हारे जैसा ईमानदार चौकीदार हमें दूसरा कहाँ मिलेगा? तनख्वाह तो तुम्हारी हम एक रुपया और भी बढ़ा सकते हैं, पर तुमको ड्योढ़ी पर ही रहना होगा।”

हीरासिंह क्या कहता! उसने गाय को पुचकारकर कहा – “सुंदरिया जाओ, जाओ।” गाय ने उसकी ओर देखा। जैसे पूछना चाहती थी – क्या सचमुच ही इसके साथ चली जाऊँ?”
हीरासिंह ने उसे थपथपाया तो वह घोसी के पीछे-पीछे चली गई। हीरासिंह एकटक देखता रहा। लेकिन अगले दिन गड़बड़ हुई। सेठ जी ने हीरासिंह को बुलाकर कहा— “तुमने मुझे धोखे में क्यों रखा? गाय से सवेरे पाँच सेर भी तो नहीं उतरा।”
हीरासिंह ने कहा— “मैंने खुद पंद्रह सेर से ऊपर दूध दुहकर आपको दिया था ।
“सेठ जी ने कहा – “तो जाकर गाय को देखो।”
हीरासिंह गाय के पास गया। पुचकारकर कहा – “सुंदरिया, मेरी रुसवाई क्यों कराती है?”
गाय ने मुँह ऊपर उठाया मानो पूछ रही हो – “बोलो मुझे क्या करना है?” हीरासिंह ने घोसी से कहा- “बालटी लाओ।”
घोसी ने कहा – “मैं तो पहले ही दुह चुका हूँ।”
“पर तुम बालटी तो लाओ।” हीरासिंह बोला।
उसके बाद साढ़े तेरह सेर दूध उसके तले से तोलकर हीरासिंह ने घोसी को दे दिया। कहा – “यह दूध सेठ जी को दे देना।” फिर गाय के गले पर सिर रखकर बोला – “सुंदरिया, देख… मेरी ओछी मत करा। मैं दूर हूँ तो क्या ! इसमें मुझे सुख है?”

गाय मुँह झुकाए वैसी ही खड़ी रही। दूसरे दिन फिर वही हुआ। लाख कोशिश के बाद भी गाय ने पूरा दूध नहीं दिया। सेठ जी ने हीरासिंह को बुलाकर कहा – “क्यों हीरासिंह, यह क्या है? यह तो सरासर धोखा है।” हीरासिंह चुप रहा।
सेठ जी ने कहा “ऐसा ही है तो ले जाओ अपनी गाय और मेरे रुपए वापस करो।” लेकिन रुपए हीरासिंह गाँव भेज चुका था। उसमें से काफी रुपया मकान की मरम्मत में लग गया था। अब सेठ जी को देने के लिए रुपए कहाँ से लाए?
उसे चुप देख, सेठ जी बोले – “अच्छा, तनख्वाह में से रकम कटती जाएगी। जब पूरी हो जाएगी तो अपनी गाय ले जाना ।”
अगले दिन सवेरे बहुत-सा दूध ड्योढ़ी में बिखरा हुआ था। उससे पहली शाम गाय ने दूध देने से बिलकुल इनकार कर दिया था।
सेठ जी ने पूछा – “हीरा, यह क्या बात है?” हीरासिंह सिर झुकाकर रह गया।
फिर उसने पूछा- “रात गाय खुली तो नहीं रह गई थी? आप इसकी खबर तो लीजिए।”
घोसी को बुलाकर पूछा गया तो उसने कहा “कल रात मैंने गाय को खुद खूँटे से बाँधा था।”
हीरासिंह ने कहा— “नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। गाय रात को आकर ड्योढ़ी में खड़ी रही है और अपना दूध गिरा गई है।”
सेठ जी बोले – “ऐसी मसनूई बातें औरों से कहना। जाओ, खबर लगाओ कि वह कौन आदमी है, जिसकी करतूत है?”
हीरासिंह चुपचाप अपनी कोठरी में जाकर लुढ़क गया। कब आँख लगी, कुछ पता नहीं। रात को अचानक लगा कि दरवाजे की ओर से रगड़ की आवाज आई। उठकर दरवाजा खोला। देखा, सुंदरिया खड़ी है।
मुँह ऊपर उठाकर सुंदरिया उसे अपराधी की आँखों से देख रही थी। मानो क्षमा याचना कर रही हो। जैसे कहती हो ‘मैं अपराधिनी हूँ। लेकिन मुझे क्षमा कर देना । मैं बड़ी दुखिया हूँ।’
देखकर हीरासिंह विह्वल हो उठा। उसके आँसू रोके न रुके। वह सुंदरिया की गर्दन से लिपट देर तक सिसकता रहा ।
अगले सवेरे उसने सेठ जी से कहा-“आप मुझसे जितने महीने चाहें कसकर चाकरी करवाएँ, पर गाय आज ही यहाँ से गाँव चली जाएगी। रुपए जब आपके चुकता हो जाएँ, मुझसे कह दीजिएगा। तब मैं भी छुट्टी कर लूँगा ।”
और सेठ जी कुछ कहें, इससे पहले ही हीरासिंह गाय को लेकर चल दिया।
-जैनेंद्र कुमार
शिक्षण-संकेत – इस कहानी में कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग हुआ है जो प्रारंभिक हिंदी में प्रचलित थे। उदाहरण के लिए सिपुर्द, रुसवाई, मसनूई आदि। इनका अर्थ क्रमशः सौंपना, अपमान और बनावटी है। शिक्षक, बच्चों को ऐसे अन्य शब्द उनके अर्थ सहित शब्दकोश की सहायता से ढूँढ़ने तथा वाक्यों में प्रयोग करने के लिए प्रेरित करें।
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