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मेरा बचपन Class 5 Summary Explanation in Hindi Chapter 7

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मेरा बचपन Class 5 Summary in Hindi

मेरा बचपन Class 5 Hindi Summary

मेरा बचपन का सारांश

इस पाठ में लेखक प्रेमचंद अपने बचपन के उन शुरुआती अनुभवों की दर्शाते हैं जिसमें ग्रामीण परिवेश, सादगी, पुराने खेलों आदि की झलक देखने को मिलती है। वे अपने चचेरे भाई हलधर के साथ दूसरे गाँव में पढ़ने जाया करते थे।

उनके घर से थोड़ी दूरी पर ही रामलीला मैदान था। वहीं किसी घर में रामलीला में अभिनय करने वाले पात्रों को सजाया जाता था। लेखक बड़े उत्साह से रामलीला के कार्यों में हाथ बँटाते थे। उनका मानना था कि गुल्ली-डंडा सभी खेलों का राजा है।

बस किसी पेड़ की टहनी काटकर गुल्ली बनाओ और खेल शुरू। वे चाहते थे कि स्कूलों में भारतीय खेलों को प्राथमिकता दी जाए क्योंकि ये विलायती खेलों की तुलना में कम खर्चीले होते हैं।

मेरा बचपन Class 5 Summary Explanation in Hindi Chapter 7 1

लोग ऐसे खेल खेलने से बचते हैं क्योंकि इससे आँख फूट जाने कर डर बना रहता है लेकिन क्रिकेट से भी सिर पर लगने का डर रहता ही है। फिर भी लोग क्रिकेट को पसंद करते हैं। वे अपने गुल्ली-डंडा खेलने, छोटे-मोटे झगड़े, फिर भी सरल भाव और अमीरी-गरीबी से कोसों दूर थे। वे मानते हैं कि गुल्ली में सारी दुनिया की मिठाइयों की मिठास भरी हुई है।

मेरा बचपन Class 5 Summary in Hindi

  • भारतीय ग्रामीण खेलों की ओर बच्चों का पुनः रुझान समावेशित करना ।
  • बचपन एक महत्त्वपूर्ण और यादगार समय होता है, जिसमें आनंद, सरलता और मासूमियत होती है।
  • यह पाठ बच्चे के निश्छल मन, परिवार के महत्व और मित्रों के साथ बिताए पलों को सहजता से मदद करता है।
  • यह पाठ हमें तत्कालीन सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत से भी अवगत कराता है।
  • इस पाठ को पढ़ने के उपरांत विद्यार्थियों को स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने की प्रेरणा मिलेगी।
  • इस पाठ से हमें अमीर और गरीब में भेद-भाव न रखने की प्रेरणा मिलती है।

प्रेमचंद की कहानी “मेरा बचपन” में लेखक ने अपने गरीबी और अभावों से भरे बचपन का वर्णन किया है। उन्होंने अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए, नंगे बदन, नंगे पाँव खेतों में घूमने, आम के पेड़ों पर चढ़ने और अपने गाँव के कच्चे-टूटे घर, पुआल के बिछौने का वर्णन किया है। कहानी में प्रेमचंद ने अपने बचपन के संघर्षों, खुशियों और अनुभवों को बहुत ही भावनात्मक रूप से व्यक्त किया है। जिससे पाठकों को उनके जीवन के शुरुआती दौर की झलक मिलती है। उन्होंने अपने बचपन के खेल, दोस्तों और गाँव के जीवन का भी वर्णन किया है।

इस पाठ में लेखक के बचपन वाली मनमौजी स्वभाव और शरारत को दर्शाया गया है, जो नासमझ भाव को व्यक्त करता है।

इस पाठ से हमें यह शिक्षा मिलती है कि- बचपन मासूमियत, नासमझी, शरारत और निश्छल मन का होता है। यह अमीरी-गरीबी और जातिगत भेद-भाव से रहित होता है।

मेरा बचपन शब्दार्थ –

पयाल – धान, गेहूँ, जौ, राई आदि फसलों के सूखे डंठल / भूसा,
जेठ – उम्र में बड़ा,
चबेना – भुना हुआ अन्न,
थापी – एक चौड़ा और सपाट लकड़ी का टुकड़ा,
विलायती – विदेशी,
कौड़ी – मुद्रा का एक रूप,
भय – डर,
चौके – रसोईघर
सुध – होश ।
मुहावरा – जी लोट-पोट होना- मन अत्यधिक प्रसन्न होना ।

Class 5 Hindi Chapter 7 Summary मेरा बचपन

हाय बचपन! तेरी याद नहीं भूलती। वह कच्चा टूटा घर, वह पयाल का बिछौना, वह नंगे बदन, नंगे पाँव खेतों में घूमना, आम के पेड़ों पर चढ़ना, सारी बातें आँखों के सामने फिर रही हैं।

मैं अपने चचेरे भाई हलधर के साथ दूसरे गाँव में एक मौलवी साहब के यहाँ पढ़ने जाया करता था। मेरी उम्र आठ साल थी, हलधर मुझसे दो साल जेठे थे। हम दोनों प्रातःकाल मटर और जौ का चबेना लेते थे।

रामलीला में भी आनंद आता था। मेरे घर से बहुत थोड़ी दूर पर रामलीला मैदान था। जिस घर में लीला पात्रों का रूप-रंग भरा जाता था, वह तो मेरे घर से बिलकुल मिला हुआ था। दो बजे दिन से पात्रों की सजावट शुरू होने लगती। मैं दोपहर से ही वहाँ जा बैठता। जिस उत्साह से दौड़कर छोटे-मोटे काम करता, उस उत्साह से तो आज अपनी पेंशन लेने भी नहीं जाता।

मेरा बचपन Class 5 Summary Explanation in Hindi Chapter 7 2

गुल्ली-डंडा सब खेलों का राजा है । अब भी कभी लड़कों को गुल्ली-डंडा खेलते देखता हूँ तो जी लोट-पोट हो जाता है कि इनके साथ जाकर खेलने लगूँ। न लॉन की जरूरत, न कोर्ट की, न थापी की, मजे से किसी पेड़ से एक टहनी काट ली, गुल्ली बना ली और दो आदमी भी आ गए तो खेल शुरू हो गया । विलायती खेलों में सबसे बड़ा ऐब है कि उनके सामान महँगे होते हैं।

पर हम अंग्रेजी चीजों के पीछे ऐसे दीवाने हो रहे हैं कि अपनी सभी चीजों से अरुचि हो गई है। हमारे स्कूलों में हरेक लड़के से तीन-चार रुपये सालाना केवल खेलने की फीस ली जाती है। किसी को यह नहीं सूझता कि भारतीय खेल खिलाएँ जो बिना दाम, कौड़ी के खेले जाते हैं।

ठीक है, गुल्ली से आँख फूट जाने का भय रहता है तो क्या क्रिकेट से सिर टट जाने का भय नहीं रहता! अगर हमारे माथे में गुल्ली का दाग आज तक बना हुआ है तो हमारे कई दोस्त ऐसे भी हैं जो थापी को बैसाखी से बदल बैठे। खैर, यह तो अपनी-अपनी रुचि है, मुझे गुल्ली ही सब खेलों से अच्छी लगती है।

प्रातःकाल घर से निकल जाना, पेड़ पर चढ़कर टहनियाँ काटना और गुल्ली-डंडा बनाना। वह उत्साह, वह लगन, वह खिलाड़ियों के जमघट, वह लड़ाई-झगड़े, वह सरल स्वभाव, अमीर-गरीब का बिलकुल भेद न था, अभिमान की गुंजाइश ही न थी।

घरवाले बिगड़ रहे हैं, पिताजी चौके पर बैठे रोटियों पर अपना क्रोध उतार रहे हैं। न नहाने की सुध है, न खाने की । गुल्ली है जरा-सी, पर उसमें दुनिया भर की मिठाइयों की मिठास और तमाशों का आनंद भरा है।

– प्रेमचंद
(रत्न सागर प्रकाशन से साभार)

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